विस्तृत उत्तर
भगवान वामन ने महाराजा बलि से भिक्षा के रूप में अपने पैरों के नाप से केवल तीन पग भूमि मांगी। उस समय बलि निन्यानवे अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर चुके थे और सौवें अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से देवराज इंद्र का पद स्थायी रूप से प्राप्त करने वाले थे। देवताओं पर संकट आया, और देवताओं की माता अदिति की तपस्या तथा प्रार्थना से भगवान विष्णु वामन रूप में प्रकट हुए। वे भृगुकच्छ में बलि के यज्ञ में पहुँचे और तीन पग भूमि मांगी। शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह याचक साक्षात् भगवान विष्णु हैं, जो देवताओं का कार्य सिद्ध करने और बलि का सर्वस्व हरण करने आए हैं। लेकिन बलि ने दान-वचन निभाया। तीन पग भूमि की मांग के माध्यम से भगवान ने बलि की सत्यनिष्ठा, दानवीरता और पूर्ण आत्म-समर्पण को प्रकट किया।
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