विस्तृत उत्तर
काव्या माता वध और वामन अवतार का संबंध अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण है। काव्या माता की घटना ने शुक्राचार्य के मन में देवताओं और विष्णु के प्रति रोष को गहरा किया। वे असुरों के गुरु के रूप में और अधिक दृढ़ हुए और मृत संजीवनी विद्या से असुरों को बल देने लगे। आगे चलकर यही शुक्राचार्य राजा बलि के गुरु बने। राजा बलि ने तप, यज्ञ और शुक्राचार्य के मार्गदर्शन से देवताओं को पराजित किया। तब भगवान विष्णु वामन अवतार में आए और बलि से तीन पग भूमि माँगकर देव-व्यवस्था पुनः स्थापित की। इस तरह काव्या माता वध से शुरू हुई देव-असुर तनाव की रेखा वामन लीला तक पहुँचती है।
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