विस्तृत उत्तर
उपनिषदों में आकर माँ सरस्वती नदी या केवल वाणी की देवी की सीमा से परे जाकर साक्षात् 'ब्रह्मविद्या' (Supreme Spiritual Knowledge) बन जाती हैं।
कृष्ण यजुर्वेद की श्वेताश्वतर शाखा से संबद्ध 'सरस्वती रहस्य उपनिषद्' (Sarasvati-Rahasya Upanishad) इस अद्वैत स्वरूप का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। यह उपनिषद शाक्त परंपरा के आठ प्रमुख उपनिषदों में से एक है। इसमें कुल २ अध्याय और ४७ श्लोक हैं।
यह उपनिषद सरस्वती को संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना, ज्ञान और ध्वनि के अंतिम स्रोत के रूप में स्थापित करता है।
यह उपनिषद यह भी स्पष्ट करता है कि ब्रह्मा के चार मुखों रूपी कमल में निवास करने वाली 'हंस' (परम चेतना) माँ सरस्वती ही हैं। अतः वाणी का अंतिम लक्ष्य केवल संप्रेषण नहीं, बल्कि ब्रह्म के साथ एकत्व स्थापित करना है।





