विस्तृत उत्तर
सरस्वती रहस्य उपनिषद् की सबसे महान घोषणाओं में से एक है:
स्वानुभूतिरसावेशाद्दृश्यशब्दाद्यपेक्षितुः। निर्विकल्पः समाधिः स्यान्निवान्तस्थितदीपवत्॥
भावार्थ: जब साधक का मन भौतिक और सांसारिक वस्तुओं (empirical objects) से उत्पन्न होने वाले मिथ्या विचारों और लगाव से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, तो उसका मन वायु-रहित स्थान में रखे हुए दीपक (sheltered lamp) के समान पूर्णतः स्थिर हो जाता है। इसी अवस्था को 'निर्विकल्प समाधि' कहा गया है, जहाँ साधक अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान कर सर्वोच्च आनंद का अनुभव करता है।





