विस्तृत उत्तर
देवता अत्यंत भयभीत होकर भगवान विष्णु और शिव की शरण में गए। भगवान शिव ने परामर्श दिया कि इस प्रलयंकारी अग्नि को केवल जल-स्वरूपिणी ज्ञान की देवी माँ सरस्वती ही धारण कर सकती हैं, और यदि वे इसे समुद्र में विसर्जित कर दें, तो ब्रह्मांड बच सकता है।
देवता सरस्वती के पास पहुँचे, लेकिन देवी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे स्वतंत्र रूप से ऐसा नहीं कर सकतीं, वे केवल अपने स्रष्टा और स्वामी ब्रह्मा जी की आज्ञा का ही पालन करेंगी। तदुपरांत, ब्रह्मा जी ने सरस्वती को आदेश दिया कि वे एक नदी का रूप धारण करें और इस अग्नि को महासागर तक ले जाएँ।
भगवान विष्णु (पुंडरीकाक्ष) ने उस अग्नि से पूछा कि वह सरस्वती के साथ किस वाहन से जाना चाहेगी। अग्नि ने कहा कि वह केवल एक शुद्ध कुंवारी कन्या के हाथ के स्पर्श से ही जाएगी। तब देवी सरस्वती ने एक कुंवारी कन्या का रूप धारण कर उस प्रलयंकारी वाडवाग्नि को एक स्वर्ण पात्र में रखा।
सरस्वती उस वृक्ष में समाहित होकर एक वेगवती नदी के रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुईं। वे उस अग्नि को धारण कर पश्चिम दिशा में बहने लगीं। पुष्कर क्षेत्र से होते हुए, अंततः उन्होंने अपनी यात्रा के अंतिम चरण में उस भयंकर अग्नि को महासागर में विसर्जित कर दिया।
दार्शनिक अर्थ: यह कथा इस बात का प्रतीक है कि क्रोध, प्रतिशोध और विनाश की प्रचंड अग्नि (वाडवाग्नि) को केवल शुद्ध ज्ञान, शीतलता और विवेक (सरस्वती) के निरंतर प्रवाह से ही शांत किया जा सकता है।





