विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के प्रथम अध्याय में सप्तद्वीपों की उत्पत्ति की एक अत्यंत रोचक कथा मिलती है। महाराज प्रियव्रत ने जब देखा कि भगवान सूर्य के प्रकाश के कारण पृथ्वी का केवल आधा भाग ही प्रकाशित होता है और शेष आधा भाग अंधकार में डूबा रहता है तो उन्होंने रात्रि के अंधकार को मिटाने का निश्चय किया। उन्होंने सूर्य के रथ का अनुसरण करते हुए एक अत्यंत तेजोमय रथ पर सवार होकर पृथ्वी की सात बार परिक्रमा की। महाराज प्रियव्रत के इस अलौकिक रथ के पहियों के प्रगाढ़ दबाव से पृथ्वी पर जो सात गहरी वलयाकार खाइयाँ बनीं वे ही कालांतर में सात महासागरों में परिवर्तित हो गईं और उन महासागरों के मध्य बचे हुए वृत्ताकार भू-भाग सप्त-द्वीप कहलाए।
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