विस्तृत उत्तर
16वीं से 18वीं सदी के बीच बंगाल/ओडिशा में सूफीवाद और वैष्णववाद के मिलन से 'सत्य पीर' की पूजा शुरू हुई, जो हिंदुओं के लिए 'नारायण' और मुस्लिमों के लिए 'पीर' थे। बंगाली 'सत्य पीर पांचाली' की कथाएं (गरीब ब्राह्मण, व्यापारी का संकट) संस्कृत सत्यनारायण कथा से हूबहू मिलती हैं। विद्वानों का मत है कि बाद में इस लोकप्रिय परंपरा का 'संस्कृतिकरण' (Sanskritization) किया गया: 'सत्य पीर' को 'सत्यनारायण' नाम दिया गया, इसे स्कंद पुराण में जोड़ा गया, और कच्चे प्रसाद 'शिन्नी' को पक्के हलवे में बदला गया। आज भी बंगाल में सत्यनारायण पूजा में 'शिन्नी' (फारसी शब्द 'शीरीनी') का प्रसाद बनता है।





