विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के पञ्चम स्कन्ध (५.२३.९) में शिशुमार चक्र और उससे ऊपर स्थित महर्लोक के संबंध का विशद वर्णन है। शिशुमार चक्र की धुरी ध्रुवलोक है जो स्वर्लोक की सर्वोच्च सीमा है। महर्लोक इसी शिशुमार चक्र और ध्रुवलोक की सीमाओं से परे अत्यंत ऊँचाई पर एक करोड़ योजन ऊपर स्थित है। इस प्रकार शिशुमार चक्र स्वर्लोक की खगोलीय व्यवस्था है जबकि महर्लोक उससे परे है। भागवत (५.२३.९) का श्लोक स्पष्ट करता है कि यह पूरा शिशुमार चक्र और इसके ऊपर स्थित महर्लोक भगवान का साक्षात् आधिदैविक स्वरूप है जिसका तीनों संध्याओं में स्मरण करने से समस्त पापों का तत्क्षण नाश हो जाता है। शिशुमार चक्र का अंत जहाँ ध्रुवलोक पर होता है वहाँ से महर्लोक की यात्रा शुरू होती है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





