विस्तृत उत्तर
शिवलिंग पर तुलसी न चढ़ाने का विधान शिव पुराण एवं पद्म पुराण में स्पष्ट रूप से वर्णित है। इसके पीछे की पौराणिक कथा:
मुख्य पौराणिक कथा (शिव पुराण/पद्म पुराण)
पूर्व जन्म में तुलसी का नाम 'वृंदा' था। वृंदा, जालंधर नामक शक्तिशाली राक्षस की पत्नी थी। जालंधर भगवान शिव का ही अंश था, किन्तु बुरे कर्मों के कारण राक्षस कुल में जन्मा।
जालंधर अत्यंत शक्तिशाली था क्योंकि उसकी पत्नी वृंदा परम पतिव्रता थी। उसके पातिव्रत्य धर्म के प्रभाव से जालंधर को कोई देवता भी युद्ध में पराजित नहीं कर सकता था।
जालंधर के बढ़ते अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। भगवान शिव और विष्णु ने मिलकर योजना बनाई। भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा के पास गए और छल से उसका पातिव्रत्य धर्म भंग कर दिया।
पातिव्रत्य भंग होते ही भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।
जब वृंदा को सत्य ज्ञात हुआ, तो उसने:
- ▸भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वे पत्थर (शालिग्राम) बन जाएंगे।
- ▸भगवान शिव को दोषी ठहराया क्योंकि उन्होंने यह योजना बनाई।
- ▸वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उनके भस्म से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ।
इसी कारण
- 1तुलसी का शिव के प्रति विरोधी भाव रहा — अतः शिव पूजा में तुलसी वर्जित।
- 2शिव ने वृंदा के पति का वध किया — अतः तुलसी (वृंदा) शिव की पूजा स्वीकार नहीं करती।
- 3तुलसी विष्णु-प्रिया हैं, शालिग्राम (विष्णु) की पत्नी — अतः उनकी पूजा विष्णु के साथ होती है, शिव के साथ नहीं।
एक भिन्न मत — निर्णयसिंधु और ब्रह्म पुराण
यह ध्यान देने योग्य है कि कुछ शास्त्रों में भिन्न मत भी मिलता है। ब्रह्म पुराण में एक श्लोक में कुश, पुष्प, धत्तूर, मंदार, द्रोणपुष्प, तुलसीदल और बिल्वपत्र सभी से शिव पूजा का विधान बताया गया है। निर्णयसिंधु (कमलाकर भट्ट, 1612 ई.) में भी कहा गया है कि विष्णु-प्रिय पत्र-पुष्प शिव को भी अर्पित किए जा सकते हैं, केवल केतकी का निषेध है। कुछ शैव परंपराओं में हरिहर (शिव-विष्णु संयुक्त) पूजन में तुलसी स्वीकार्य मानी गई है।
सार
बहुसंख्यक परंपराओं, शिव पुराण और पद्म पुराण के आधार पर शिवलिंग पर तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए। किन्तु कुछ ग्रंथों (ब्रह्म पुराण, निर्णयसिंधु) में इसका निषेध स्पष्ट नहीं है — यह शास्त्रीय विवाद का विषय है।





