विस्तृत उत्तर
द्वापर युग में श्री कृष्ण अवतार हुआ, जिसे शास्त्रों में १६ कलाओं से पूर्ण 'पूर्णावतार' या 'परमावतार' कहा गया है। इन्होंने भगवद्गीता का अद्भुत ज्ञान दिया और महाभारत युद्ध में धर्म की रक्षा की। यह कूटनीतिक, आध्यात्मिक और लौकिक जीवन में परिपूर्ण मनुष्य का सर्वोच्च प्रतीक है।
श्रीमद्भागवत पुराण (१.३.२८) में महर्षि वेदव्यास ने स्पष्ट किया है कि 'एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' अर्थात् अन्य सभी अवतार भगवान के अंश या कला हैं, किंतु श्री कृष्ण स्वयं पूर्ण भगवान (परब्रह्म) हैं।
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