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विस्तृत उत्तर
भारतीय दर्शन और वेदों के अनुसार चंद्रमा मन का अधिष्ठाता है (चंद्रमा मनसो जातः)। वैदिक ज्योतिष में पीड़ित चंद्रमा (नीच, राहु-केतु के साथ ग्रहण दोष, या विष दोष) जातक में भयंकर मानसिक अवसाद, अज्ञात भय, अनिद्रा और विक्षिप्तता उत्पन्न करता है।
सोम' का अर्थ शीतलता और चंद्र-ऊर्जा है, तथा 'नंदी' का अर्थ परमानंद है। सोमानंदीश्वर का अर्थ है वह ईश्वर जो सोम-तत्त्व के माध्यम से आत्मा को परमानंद में स्थापित करता है। शिव (अमन अवस्था) ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया, जो दर्शाता है कि शिवोपासना से मन पूर्णतः नियंत्रित और चेतना के अधीन हो जाता है। यहाँ की गई साधना शिव-तत्त्व और सोम-तत्त्व का एकीकरण करती है। इस लिंग की स्थापना ही मन की उग्रता को शांत करने के लिए हुई थी, अतः यहाँ किया गया रुद्राभिषेक और ध्यान सीधे जातक के अवचेतन मन की नकारात्मक ग्रंथियों को खोलता है और चंद्र-दोषों को नष्ट करता है।
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