विस्तृत उत्तर
स्वर्ग से वापसी तब होती है जब जीव के संचित पुण्य समाप्त हो जाते हैं। भगवद्गीता (9.21) में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि स्वर्लोक के विशाल सुखों को भोगने के पश्चात जब जीवात्मा का संचित पुण्य क्षीण हो जाता है तो उसे अनिवार्य रूप से पुनः मृत्युलोक पर लौटकर जन्म लेना पड़ता है। विष्णु पुराण में महर्षि पराशर भी कहते हैं कि स्वर्ग में भी जीव को पतन का निरंतर भय सताता रहता है। जब किसी देव या पुण्यात्मा के पुण्य समाप्त होने लगते हैं तो उसके शरीर से पसीना आने लगता है और उसके गले में पड़ी दिव्य पुष्पों की माला कुम्हलाने (मुरझाने) लगती है। यह इस बात का संकेत होता है कि अब उसे स्वर्ग से निष्कासित होकर पुनः माता के गर्भ के कष्टों और जीवन-मृत्यु के चक्र से गुजरना पड़ेगा।
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