विस्तृत उत्तर
ठाकुर जी शब्द मुख्यतः वैष्णव परंपरा में — विशेषतः पुष्टिमार्ग (वल्लभ सम्प्रदाय) में — श्रीकृष्ण के विग्रह या प्रतिमा के लिए प्रयुक्त होता है। ठाकुर जी का श्रृंगार केवल वस्त्र-आभूषण पहनाना नहीं, बल्कि एक गहरी भक्तिपूर्ण सेवा है। पुष्टिमार्गीय परंपरा में श्रृंगार को तीन मुख्य अंगों में से एक माना गया है — श्रृंगार, भोग और राग।
श्रृंगार विधि इस प्रकार है:
पूर्व तैयारी — सबसे पहले स्वयं स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ साफ हों और मन में श्रद्धा हो। ठाकुर जी के वस्त्र और आभूषण पहले से तैयार रखें।
स्नान के बाद — ठाकुर जी को स्नान (अभिषेक) कराने के बाद मुलायम कपड़े से पोंछकर श्रृंगार आरंभ करें।
वस्त्र — ऋतु के अनुसार वस्त्र पहनाएँ। ग्रीष्म में हल्के सूती और पतले वस्त्र, शरद में गर्म और शीतल समय में मखमल या ऊनी वस्त्र। वस्त्रों के रंग भी महोत्सव और तिथि के अनुसार बदले जाते हैं। पुष्टिमार्ग में परंपरागत रूप से 'पाग', 'मुकुट', 'सेहरा', 'टिपारा' आदि आठ प्रकार के शिर-श्रृंगार के उपकरण प्रचलित हैं।
मुकुट — सिर पर मोरपंख युक्त सुंदर मुकुट लगाएँ। पुष्टिमार्ग में मुकुट और पाग दोनों का विशेष महत्व है।
आभूषण — गले में वैजयंती माला, तुलसी माला या सोने-चाँदी की माला पहनाएँ। कानों में कुंडल, भुजाओं में बाजूबंद और हाथों में कड़े अर्पित करें। कमर में करधनी और पैरों में पाजेब पहनाएँ।
तिलक — माथे पर चंदन या कस्तूरी का तिलक लगाएँ। वैष्णव परंपरा में ऊर्ध्वपुंड्र (U-आकार का) तिलक लगाया जाता है।
फूल और तुलसी — श्रृंगार में ताज़े फूलों की माला अर्पित करें। तुलसी दल ठाकुर जी को अत्यंत प्रिय है।
हाथ में बाँसुरी — श्रीकृष्ण के हाथ में छोटी बाँसुरी या अन्य लीला सामग्री रखें।
भाव — पुष्टिमार्ग का सिद्धांत है कि श्रृंगार यंत्रवत नहीं, प्रेम से होना चाहिए। मानो आप स्वयं प्रभु के सेवक हैं और उन्हें वास्तव में तैयार कर रहे हैं — यही भाव श्रृंगार को दिव्य बनाता है।



