विस्तृत उत्तर
ठाकुर जी की सेवा — विशेषतः पुष्टिमार्गीय वैष्णव परंपरा में — एक व्रत की तरह निभाई जाती है। 'सेवा' शब्द यहाँ पूजा से गहरा है; इसमें ईश्वर के प्रति पुत्रवत या दासवत प्रेम का भाव है। सेवा के कुछ मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
नित्यता का नियम — ठाकुर जी को जब घर में स्थापित किया जाए, तो उनकी नित्य सेवा में कोई खंड नहीं होना चाहिए। एक दिन भी सेवा छोड़ना उचित नहीं माना जाता।
शुद्धता — सेवक को स्नान के बाद ही ठाकुर जी के सामने जाना चाहिए। मासिक धर्म, सूतक या मृत्यु-शौक जैसी अवस्था में किसी अन्य श्रद्धालु से सेवा करवाई जाए।
भोग का नियम — बिना भोग लगाए स्वयं कुछ न खाएँ। जो भी बनाएँ, पहले ठाकुर जी को अर्पित करें। भोग में तुलसी दल डालना अनिवार्य है।
ऋतु के अनुसार सेवा — गर्मी में हल्के वस्त्र और चंदन का लेप, शरद में गर्म वस्त्र और ऊनी बिछौना। ठंड के मौसम में रात को कंबल ओढ़ाएँ।
नींद की सेवा — रात में ठाकुर जी को शयन कराएँ — मुलायम बिस्तर पर लिटाएँ। प्रातः उठाकर जगाने की सेवा करें।
दृष्टि की सावधानी — ब्रज और वैष्णव परंपरा में यह कहा जाता है कि ठाकुर जी के एकदम सामने खड़े होकर एकटक न देखें, क्योंकि उनकी दिव्य ऊर्जा बहुत तीव्र होती है। किनारे से दर्शन करना उचित माना जाता है।
प्रेमभाव — पुष्टिमार्ग के अनुसार, सेवा का अर्थ है — ईश्वर को सुख मिले, न कि केवल अपनी इच्छा पूर्ण हो। इसीलिए भगवान की सेवा कर्मकांड की तरह नहीं, प्रेम की तरह होनी चाहिए।
एकाकी न छोड़ें — ठाकुर जी को लंबे समय तक अकेला न छोड़ें। यदि घर से बाहर जाना हो तो किसी विश्वासपात्र को सेवा का दायित्व सौंपें।
इन नियमों का पालन करने से घर में सुख-शांति, भक्ति और ईश्वरीय कृपा बनी रहती है।





