विस्तृत उत्तर
मंत्र शास्त्र में कहा गया है कि मंत्र देवता का 'सूक्ष्म शरीर' (ध्वनि रूप) है, और हवन (यज्ञ) देवता को 'भोजन' (ऊर्जा) पहुंचाने का माध्यम है। किसी भी बड़े अनुष्ठान या पुरश्चरण की पूर्णता बिना हवन के (दशांश हवन) संभव नहीं मानी जाती।
वेदों में अग्नि को 'पुरोहित' और देवताओं का मुख (मुखमग्नि) कहा गया है। जब हम मंत्र का उच्चारण करते हुए अग्नि में घी, जौ, तिल और जड़ी-बूटियों की आहुति (स्वाहा) देते हैं, तो अग्नि देव उस स्थूल आहुति को सूक्ष्म ऊर्जा में बदलकर सीधे ब्रह्मांड में उस इष्ट देवता तक पहुंचा देते हैं। हवन मंत्र की शक्ति को कई हजार गुना बढ़ा देता है और यज्ञ से उत्पन्न होने वाला औषधीय धुआं घर और वातावरण की सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट कर देता है।





