विस्तृत उत्तर
ऊर्ध्वरेता होने के लिए अत्यंत कठोर और दीर्घकालीन साधना आवश्यक है। ऊर्ध्वरेता वे सिद्ध और परम विरक्त ब्रह्मचारी होते हैं जिन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में कभी अपने वीर्य (प्राण ऊर्जा) का स्खलन नहीं किया है और अपनी सम्पूर्ण जैविक एवं मानसिक ऊर्जा को आध्यात्मिक तेज में परिवर्तित कर लिया है। इसके लिए आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है। साथ ही वेदों का गहन अध्ययन, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण, इन्द्रिय-निग्रह और निष्काम भावना अनिवार्य है। श्रीमद्भागवत पुराण में स्पष्ट है कि आजीवन ब्रह्मचारी जो गुरु के प्रति बिना किसी सांसारिक इच्छा के समर्पित रहते हैं वे मृत्यु के पश्चात सत्यलोक को प्राप्त होते हैं। यह अखण्ड ब्रह्मचर्य, योग और तपस्या ही उन्हें सत्यलोक का अधिकारी बनाती है।
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