विस्तृत उत्तर
भागवत पुराण (११.१८.९) में यह वर्णित है कि वे वानप्रस्थी जो वन में जाकर अत्यंत कठोर तपस्या करते हैं, जो अपने शरीर को कष्ट सहने का अभ्यस्त बना लेते हैं, जो जीवन की केवल न्यूनतम आवश्यकताओं पर जीवित रहते हैं और जिनकी देह घोर तपस्या के कारण केवल अस्थि-पंजर मात्र रह जाती है, वे भी अपने प्राण त्यागने के पश्चात इसी तपोमयी महर्लोक को प्राप्त होते हैं। वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति अपने सांसारिक दायित्वों को पूर्ण करके वन में जाकर तपस्या करता है। इस कठोर तपस्या में वह कंद-मूल पर निर्वाह करता है, देह को सहने का अभ्यस्त बनाता है और परब्रह्म के चिंतन में लीन रहता है।
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