विस्तृत उत्तर
वितल लोक में दैत्य-दानवों का जीवन पूर्णतया ऐंद्रिय सुखों, विलासिता और भौतिक संपन्नता पर आधारित है। वे सदा मदिरा, सुमधुर संगीत, वीणा, वेणु और मृदंग की ध्वनि में मग्न रहते हैं। उनकी पत्नियाँ और दैत्य-दानव कन्याएँ अत्यंत सुंदर और आकर्षक हैं तथा हाटक स्वर्ण से बने आभूषणों और बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित रहती हैं। इन निवासियों के हृदय में बुढ़ापे, बीमारी, पसीने, दुर्गंध या मृत्यु का कोई भय नहीं होता, क्योंकि भौतिक सिद्धियाँ और रसायन विद्याएँ उन्हें चिर-यौवन देती हैं। फिर भी, इतना ऐश्वर्य होने पर भी उनमें आध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है और वे वासना तथा अहंकार के वशीभूत होकर जीवन बिताते हैं।
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