विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में यक्षों का चरित्र द्वैतवादी बताया गया है क्योंकि उनमें दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। एक ओर वे परोपकारी, निरिह और प्राकृतिक संपदा के रक्षक होते हैं। प्राचीन काल में नगरों, झीलों और कबीलों के रक्षक देवता के रूप में यक्षों की पूजा होती थी। दूसरी ओर उनका एक भयंकर और तामसिक रूप भी है, जिसमें वे निर्जन वनों और पर्वतों में भटकने वाले यात्रियों को भटकाते हैं, उन्हें छलते हैं और कभी-कभी राक्षसों के समान हिंसक होकर मनुष्यों का भक्षण भी करते हैं। इसी विरोधी स्वभाव के कारण उनका चरित्र द्वैतवादी कहा गया है।
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