विस्तृत उत्तर
यमलोक और कर्म-विपाक से यह सीख मिलती है कि जीव का कोई भी कर्म, चाहे वह कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो, ब्रह्मांडीय न्याय व्यवस्था की दृष्टि से बच नहीं सकता। गरुड़ पुराण में कर्म-विपाक का सिद्धांत बताया गया है कि नरक की यातनाएँ पूर्ण करने के पश्चात पापी जीवात्मा सीधे मनुष्य योनि नहीं पाती, बल्कि वृक्ष, कीट, पशु, पक्षी आदि ८४ लाख योनियों में भटकती है। अनेक नीच योनियों में कष्ट सहने के बाद जब वह मनुष्य योनि प्राप्त करती है, तब भी उसके पूर्व जन्म के पापों के चिह्न शरीर पर प्रकट होते हैं। यमलोक की व्यवस्था में यमराज न्यायाधीश, चित्रगुप्त अभिलेखक, श्रवण-श्रवणी गुप्तचर और यमदूत दंडाधिकारी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सत्य, धर्म, दान, अहिंसा और भगवान के प्रति समर्पण ही आत्मा की श्रेष्ठ गति का आधार हैं।
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