विस्तृत उत्तर
यममार्ग की यात्रा में श्राद्ध और पिंडदान का गहरा महत्व है। इस यात्रा में आत्मा १६ नगरों से होकर गुजरती है और जब वह इन नगरों में पहुँचती है, तो उसे कुछ क्षणों का विश्राम मिलता है। मृत्यु के अठारहवें दिन आत्मा वायु के वेग से चलते हुए सर्वप्रथम सौम्यपुर पहुँचती है और वहाँ उसे परिजनों द्वारा दिया गया प्रथम पिंड प्राप्त होता है। दूसरे मास में सौरिपुर पहुँचकर वह द्वितीय मास का पिंड ग्रहण करती है। इसी प्रकार आगे के नगरों में मासिक पिंडों का संबंध आत्मा की यात्रा से जुड़ा है। जब आत्मा देखती है कि उसके परिजन उसकी संपत्ति के लिए लड़ रहे हैं और उसके लिए पिंडदान नहीं कर रहे, तो वह भूख-प्यास से तड़पती हुई विलाप करती है और पश्चाताप करती है कि जिनके लिए उसने जीवन भर पाप किए, वे आज उसके किसी काम नहीं आ रहे।
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