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श्रीमद्भगवद्गीता · भक्ति योग

श्लोक 16

भक्ति योग · Bhakti Yoga

मूल पाठ

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः | सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

English Meaning

He who is free from wants, pure, expert, unconcerned, and free from pain, renouncing all undertakings or commencements he who is (thus) devoted to Me, is dear to Me.

He who is free from wants, pure, expert, unconcerned, and free from pain, renouncing all undertakings or commencements he who is (thus) devoted to Me, is dear to Me.

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