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श्रीमद्भगवद्गीता · श्रद्धात्रय विभाग योग

श्लोक 25

श्रद्धात्रय विभाग योग · Shraddhatraya Vibhaga Yoga

मूल पाठ

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः | दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

'तत्' नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है -- ऐसा मानकर मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा फलकी इच्छासे रहित होकर अनेक प्रकारकी यज्ञ और तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ की जाती हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

'तत्' नामसे कहे जानेवाले परमात्माके लिये ही सब कुछ है -- ऐसा मानकर मुक्ति चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा फलकी इच्छासे रहित होकर अनेक प्रकारकी यज्ञ और तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ की जाती हैं।

English Meaning

Uttering ï1Tatï1, without aiming at the fruits, are the acts of sacrifice and austerity and the various acts of gifts performed by the seekers of liberation.

Uttering ï1Tatï1, without aiming at the fruits, are the acts of sacrifice and austerity and the various acts of gifts performed by the seekers of liberation.

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