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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 10

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते | त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है।

English Meaning

The man of renunciation, pervaded by purity, intelligent, and with his doubts cut asunder, does not hate a disagreeable work nor is he attached to an agreeable one.

The man of renunciation, pervaded by purity, intelligent, and with his doubts cut asunder, does not hate a disagreeable work nor is he attached to an agreeable one.

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