अर्जुन उवाच | संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् | त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन
अर्थ: अर्जुन बोले -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते | हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते
जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।
जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।
He who is free from the egoistic notion, whose intelligence is not tainted (by good or evil), though he slays these people, he slayeth not, nor is he bound (by the action).
He who is free from the egoistic notion, whose intelligence is not tainted (by good or evil), though he slays these people, he slayeth not, nor is he bound (by the action).
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