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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 43

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।

English Meaning

Prowess, splendour, firmness, dexterity and also not fleeing from battle, generosity and lordliness are the duties of the Kshatriyas, born of (their own) nature.

Prowess, splendour, firmness, dexterity and also not fleeing from battle, generosity and lordliness are the duties of the Kshatriyas, born of (their own) nature.

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