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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 42

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

मनका निग्रह करना इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।

English Meaning

Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness and also uprightness, knowledge, realisation and belief in God are the duties of the Brahmanas, born of (their own) nature.

Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness and also uprightness, knowledge, realisation and belief in God are the duties of the Brahmanas, born of (their own) nature.

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