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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 45

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः | स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।

English Meaning

Each man devoted to his own duty attains perfection. How he attains perfection while being engaged in his own duty, hear now.

Each man devoted to his own duty attains perfection. How he attains perfection while being engaged in his own duty, hear now.

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