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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 52

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः | ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

English Meaning

Dwelling in solitude, eating but little, with speech, body and mind subdued, always engaged in meditation and concentration, resorting to dispassion.

Dwelling in solitude, eating but little, with speech, body and mind subdued, always engaged in meditation and concentration, resorting to dispassion.

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