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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 51

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च | शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

English Meaning

Endowed with a pure intellect, controlling the self by firmness, relinishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred.

Endowed with a pure intellect, controlling the self by firmness, relinishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred.

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