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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 67

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन | न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना; अभक्तको कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना; अभक्तको कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना।

English Meaning

This is never to be spoken by thee to one who is devoid of austerities or devotion, nor to one who does not render service or who does not desire to listen, nor to one who cavils at Me.

This is never to be spoken by thee to one who is devoid of austerities or devotion, nor to one who does not render service or who does not desire to listen, nor to one who cavils at Me.

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