भगवान कृष्ण (एवं कामदेव) बीज बीज मंत्र
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यह 'काम बीज' है। इसमें 'क' कामदेव/कृष्ण, 'ल' इंद्र देव और 'ई' परमसंतुष्टि का प्रतीक है। इसका उपयोग ईश्वरीय प्रेम (कृष्ण-प्रेम) का विकास, लौकिक व अलौकिक आकर्षण (Vashikaran), आध्यात्मिक चुंबकत्व (Spirit
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
यह 'काम बीज' है। इसमें 'क' कामदेव/कृष्ण, 'ल' इंद्र देव और 'ई' परमसंतुष्टि का प्रतीक है। इसका उपयोग ईश्वरीय प्रेम (कृष्ण-प्रेम) का विकास, लौकिक व अलौकिक आकर्षण (Vashikaran), आध्यात्मिक चुंबकत्व (Spiritual Magnetism), और सभी इच्छाओं की पूर्ण संतुष्टि के लिए होता है 13।
इस मंत्र से क्या होगा?
यह 'काम बीज' है
इसमें 'क' कामदेव/कृष्ण, 'ल' इंद्र देव और 'ई' परमसंतुष्टि का प्रतीक है
इसका उपयोग ईश्वरीय प्रेम (कृष्ण-प्रेम) का विकास, लौकिक व अलौकिक आकर्षण (Vashikaran), आध्यात्मिक चुंबकत्व (Spiritual Magnetism), और सभी इच्छाओं की पूर्ण संतुष्टि के लिए होता है
जाप विधि
सुबह 4 बजे (ब्रह्म मुहूर्त) से शांत चित्त के साथ 108 बार निरंतर जप करें। ध्यान करते समय हृदय चक्र पर ध्यान केंद्रित करें 13।
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ॐ नमो आदेश गुरु का आदेश काली काली महाकाली इन्द्र की बेटी ब्रम्हा की साली चाम की गठरी हाड़ की माला भजो आनन्द सुंदरी बाला। भरपूर वसन करले उठाई काम क्रन्ति कलिका आई लुच्ची मोहन भोग भेट कड़ाही जहा भेजा वहा जाई कष्ट दुखो से लेव बचाई सभी देत्यन को मार भगाई आदि अंत तू रही सहाई में पूत तू मेरी माई सब दुखन से लेव बचाई गुरु की शक्ति हमारी भक्ति फुरे मंत्र दोहाई काली की ईश्वरो वाचा 12
kavach mantraनासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20
ugra mantraॐ नमो महादेव को काला भैरव काली रात भैरव चले अमावसरा आगे भैरव पीछे भैरव बाएं भैरव बाएं भैरव ऊपर पर आकाश भैरव नीचे पाताल भैरव पांच कोष पूरब बांध पांच कोष पश्चिम बांध पांच कोष उत्तर पांच कोष दक्षिण बांध जल थल वन गिरी गुफा बांध सात लोक सात पाताल नौ खंड बांध घर बांध दरवाजा बांध डाकनी साकनी पिशाचनी बांध भूत प्रेत वैताल खबीस चुड़ैल बांध मरघट कोशान शमशान की राख हवेरी की विद्या घोर क्रिया बांध भैरव की जंजीर चले हर बुरी बला दुष्ट शक्ति को बांध मृत्यु का भय काल की छाया समय की रेखा मंत्र की शक्ति तंत्र को प्रहार हाथ का खप्पर शत्रु का अस्त्रघात बांध हर बुरी बला दुष्ट शत्रु से रक्षा कर लीला ऐसा मार्ग खोले ना खुले जो खोले भैरव करंड से शत्रु नरक को जाए भाई शिव शंकर की दुहाई मदाकारी की ओम भैरवाय नमः
tantrik mantraऐं क्लीं सौः
siddh mantraॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।
naam mantraलम्बोदर