ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
भगवान श्री कृष्ण (बाल स्वरूप)

भगवान श्री कृष्ण (बाल स्वरूप) भक्ति मंत्र

गोपाला गोपाला देवकीनन्दन गोपाला

हृदय में वात्सल्य और शुद्ध निःस्वार्थ प्रेम की उत्पत्ति, मानसिक क्लेशों व चिंताओं से पूर्ण मुक्ति, और भगवान के बाल स्वरूप (देवकीनंदन) के प्रति अगाध समर्पण भाव की प्राप्ति 17।

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

जप काउंटर लोड हो रहा है...

प्रकारभक्ति मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

हृदय में वात्सल्य और शुद्ध निःस्वार्थ प्रेम की उत्पत्ति, मानसिक क्लेशों व चिंताओं से पूर्ण मुक्ति, और भगवान के बाल स्वरूप (देवकीनंदन) के प्रति अगाध समर्पण भाव की प्राप्ति 17।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

हृदय में वात्सल्य और शुद्ध निःस्वार्थ प्रेम की उत्पत्ति, मानसिक क्लेशों व चिंताओं से पूर्ण मुक्ति, और भगवान के बाल स्वरूप (देवकीनंदन) के प्रति अगाध समर्पण भाव की प्राप्ति

जाप विधि

संत परंपरा में इस नाम-मंत्र का जप शुद्ध वात्सल्य भाव के साथ किया जाता है 17। इसे प्रतिदिन प्रातः और सांध्य वेला में स्फटिक या तुलसी की माला पर १०८ बार जपा जा सकता है, अथवा श्वास के साथ मानसिक रूप से जोड़ा जा सकता है 4। जप के दौरान भगवान कृष्ण के अत्यंत मोहक बाल स्वरूप का मानसिक ध्यान करना अनिवार्य है।

विशेष टिप्पणियाँ

इसे भी पढ़ें

अलग-अलग श्रेणियों से

हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें

siddh mantra

ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः

gyan mantra

योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः । स्कंदः कुमारः सेनानी स्वामी शंकरसंभवः ॥ गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः । तारकारिरुमापुत्रः क्रोधारिश्च षडाननः ॥ शब्दब्रह्मसमुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः । सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः ॥ शरजन्मा गणाधीशः पूर्वजो मुक्तिमार्गकृत् । सर्वागमप्रणेता च वांछितार्थप्रदर्शनः ॥ अष्टाविंशतिनामानि मदीयानीति यः पठेत् । प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ॥ महामंत्रमयानीति मम नामानुकीर्तनात् । महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥

naam mantra

हुताशन

stotra mantra

सनत्कुमारो वतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्। देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात्।। 7

tantrik mantra

ॐ ऐं ऐं महाभैरवि एहि एहि ईशानदिशायां बन्धय बन्धय ईशानमुखं स्तम्भय स्तम्भय ईशानशस्त्रं निवारय निवारय सर्वसैन्यं कीलय कीलय पच पच मथ मथ मर्दय मर्दय ॐ ह्लीं वश्यं कुरु करु ॐ ह्लां बगलामुखि हुं फट् स्वाहा

sabar mantra

धन जैसे चुंबक खींचे लोह गोरख की आज्ञा टले नहीं मिटे साधक का मोह कीड़ा जागे पिंगला जागे सुष्मना का खुले द्वार जब तीनों नाड़ी जागे धन आवे बारंबार जैसे गंगा बहे अविरल जैसे सूरज देत उजास वैसे मेरे घर में लक्ष्मी करे सदा ही वास रुका धन चले बंद धन खुले आवे चहुं ओर से धन गोरख का शब्द सांचा रे सांचा रे गुरु का मन काल का भी काल है गोरख तीनों लोक बसेरा जो गोरख का नाम ले साधक उसका होए उजेरा उठ उठ लक्ष्मी आव बैठ मेरे द्वार गोरख की आज्ञा लेकर आव कर मेरा उद्धार शब्द सांचा पिंड कांचा सांची गुरु की बानी हुकुम गोरखनाथ का चले यही नाथ की निशानी 5