भगवान श्री नारायण भक्ति मंत्र
ॐ नमो नारायणाय
इस मंत्र के निरंतर जप से जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का नाश होता है तथा परब्रह्म नारायण के प्रति शुद्ध भक्ति जागृत होती है 2। यह हृदय को स्थिर कर ईश्वरीय ऊर्जा से जोड़ता है, और निरंतर अभ्यास से यह पै
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस मंत्र के निरंतर जप से जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का नाश होता है तथा परब्रह्म नारायण के प्रति शुद्ध भक्ति जागृत होती है 2। यह हृदय को स्थिर कर ईश्वरीय ऊर्जा से जोड़ता है, और निरंतर अभ्यास से यह पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र को सक्रिय कर मस्तिष्क के डिफॉल्ट मोड नेटवर्क को शांत करता है, जिससे अस्तित्व संबंधी चिंताओं का नाश होकर गहरी आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है 1।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस मंत्र के निरंतर जप से जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का नाश होता है तथा परब्रह्म नारायण के प्रति शुद्ध भक्ति जागृत होती है 2
यह हृदय को स्थिर कर ईश्वरीय ऊर्जा से जोड़ता है, और निरंतर अभ्यास से यह पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र को सक्रिय कर मस्तिष्क के डिफॉल्ट मोड नेटवर्क को शांत करता है, जिससे अस्तित्व संबंधी चिंताओं का नाश होकर गहरी आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है
जाप विधि
इस अष्टाक्षर नाम-मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग ९० मिनट पूर्व) में या किसी भी शुद्ध और शांत अवस्था में किया जाना चाहिए 1। जप के लिए एक सौ आठ मनकों वाली तुलसी या स्फटिक की माला का उपयोग सर्वाधिक प्रामाणिक माना गया है, जिसे दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली पर रखकर अंगूठे से अपनी ओर खींचा जाता है 1। इस प्रक्रिया में अहंकार की प्रतीक तर्जनी उंगली का स्पर्श माला से पूर्णतः वर्जित है 1। माला के मनकों के मध्य ग्रंथि (गांठ) होना अनिवार्य है जिससे मंत्र की ऊर्जा सुरक्षित रहे और तरंगों का विस्फोट होकर सिद्धि प्राप्त हो सके 3। सुमेरु (१०८वें मनके) को लांघना निषिद्ध है, अतः चक्र पूर्ण होने पर माला को पलट कर नया चक्र आरंभ करना चाहिए 1। इसे वाचिक (स्वर के साथ), उपांशु (फुसफुसाते हुए) या मानसिक (मौन) रूप से जपा जा सकता है 1।
विशेष टिप्पणियाँ
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यया...source विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ।।1।। भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्। यथाऽऽततायिनः शत्रून्...source वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ।।3।। धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः। कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।4।। नारायणमयं वर्म संनह्येद्भय आगते। पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि ।।5।। मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्। ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा: ।।6।। करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया। प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ।।7।। न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि। षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ।।8।। वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु। मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः ।।9।। सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्। ॐ विष्णवे नम इति ।।10।। आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्। विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।11।। ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे। दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ।।12।। जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्। स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥13॥ दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः। विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥14॥ रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः। रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ॥15॥ मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्। दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥16॥ सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्। देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥17॥ धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्याद्द्वन्द्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा। यज्ञश्च लोकादवताञ्जनान्ताद् बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ॥18॥ द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात्। कल्किः कले कालमलात्प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ॥19॥ मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः। नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥20॥ 1
shanti mantraॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागँसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
kaamya mantraनमः कमलवासिन्यै स्वाहा॥
stotra mantraअच्युतस्याष्टकं य: पठेदिष्टदं प्रेमत: प्रत्यहं पूरुष: सस्पृहम्। वृत्तत: सुन्दरं कर्तृविश्वम्भर- स्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम्।। 9
beej mantraक्म्लीः
navgrah mantraॐ भगभवाय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नः शनिः प्रचोदयात्।