पंच तत्त्व (श्री कृष्ण चैतन्य एवं परिकर) भक्ति मंत्र
जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्त वृन्द
नाम-जप साधना में साधक से जाने-अनजाने होने वाले दस प्रकार के नामापराधों (अपराधों) से तत्काल मुक्ति प्राप्त करना 24। यह मंत्र भगवान की अहैतुकी (निःस्वार्थ) कृपा को आकर्षित करता है और श्री राधा-कृष्ण की
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
नाम-जप साधना में साधक से जाने-अनजाने होने वाले दस प्रकार के नामापराधों (अपराधों) से तत्काल मुक्ति प्राप्त करना 24। यह मंत्र भगवान की अहैतुकी (निःस्वार्थ) कृपा को आकर्षित करता है और श्री राधा-कृष्ण की शुद्ध प्रेममयी सेवा के योग्य बनाता है 24।
इस मंत्र से क्या होगा?
नाम-जप साधना में साधक से जाने-अनजाने होने वाले दस प्रकार के नामापराधों (अपराधों) से तत्काल मुक्ति प्राप्त करना 24
यह मंत्र भगवान की अहैतुकी (निःस्वार्थ) कृपा को आकर्षित करता है और श्री राधा-कृष्ण की शुद्ध प्रेममयी सेवा के योग्य बनाता है
जाप विधि
गौड़ीय वैष्णव परंपरा में, हरे कृष्ण महामंत्र का माला पर जप आरंभ करने से ठीक पूर्व इस पंच तत्त्व मंत्र का पूर्ण श्रद्धा से जप किया जाता है 24। इसे बिना किसी संशय के पूर्ण करुणा और याचना के भाव से उच्च स्वर या मानसिक रूप में जपना चाहिए 24।
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नासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20
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beej mantraहं
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