भगवान शिव (पंचाक्षरी मूल मंत्र) मूल मंत्र
ॐ नमः शिवाय
इस मंत्र का निरंतर जप चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है तथा मूलाधार चक्र को दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में सक्रिय करता है, जिससे आध्यात्मिक उत्थान होता है 3। इसके अतिरिक्त, यह मंत्र संपूर्ण नकारात्मकता,
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस मंत्र का निरंतर जप चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है तथा मूलाधार चक्र को दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में सक्रिय करता है, जिससे आध्यात्मिक उत्थान होता है 3। इसके अतिरिक्त, यह मंत्र संपूर्ण नकारात्मकता, शारीरिक व्याधियों एवं भय का शमन करते हुए साधक को शांति, समृद्धि, दीर्घायु एवं अंततः शिव सायुज्य (मोक्ष) प्रदान करता है 2।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस मंत्र का निरंतर जप चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है तथा मूलाधार चक्र को दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में सक्रिय करता है, जिससे आध्यात्मिक उत्थान होता है 3
इसके अतिरिक्त, यह मंत्र संपूर्ण नकारात्मकता, शारीरिक व्याधियों एवं भय का शमन करते हुए साधक को शांति, समृद्धि, दीर्घायु एवं अंततः शिव सायुज्य (मोक्ष) प्रदान करता है
जाप विधि
प्रातःकाल या सन्ध्याकाल की वेला में शारीरिक एवं मानसिक शुद्धि के उपरांत एकांत स्थान पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना शास्त्र सम्मत है 1। जप प्रक्रिया को पूर्ण एकाग्रता के साथ रुद्राक्ष की माला पर निष्पादित किया जाना चाहिए। जप अनुष्ठान के तीन प्रमुख स्तर निर्दिष्ट हैं: 'उच्चाही' (सस्वर पाठ), 'उपांशु' (मंद स्वर में पाठ), तथा 'मानसिकम' (मौन रूप से मन के भीतर पाठ), जिनमें मानसिक जप को सर्वाधिक प्रभावशाली माना गया है 3। पूर्ण लाभ हेतु प्रतिदिन न्यूनतम १०८ बार (एक माला) जप अनिवार्य है 4।
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ॐ
kavach mantraश्रीम क्लीम सरस्वती बुद्ध जन्य स्वाहा सततम मंत्र राजोयम दक्षिणे मां सदावतु ऐम ह्रीम श्रीम क्लीम त्र्यक्षरो मंत्रो नैऋत्यम सर्वदावतु ओम ऐकवासिन्य स्वाहा मां वारुणेवतु ओम सर्वांबिकाय स्वाहा वायव्यमा सदावतु ओम ऐम श्रीम क्लीम गद्यवासिन्य स्वाहा माम उत्तरेवतु ऐम सर्वशास्त्र वासिन्ये स्वाहान्य सदा ओम ह्रीम सर्व पूजिता स्वाहा चोरध्वं सदावतु ओम ह्रीम पुस्तक वासिन्य स्वाहा धोमांम सदावतु ओम ग्रंथ बीज स्वरूपाय स्वाहा मां सर्वतो वतु इति कथित विप्र ब्राह्म मंत्र विग्रहम इदम विश्व जयं नाम कवचम ब्रह्म रूपकम पंचलक्ष जपे नैव सिद्धमु कवचम भवे यदि सिद्ध कवचो बृहस्पति समो भवे महा वाग्मी कविंद्र त्रैलोक्य विजयी भवेत 27
beej mantraस्रां
ugra mantraॐ ऐं ह्रीं महाकालिकायै सर्व शत्रु नाशाय नाशाय
dhyan mantraशान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
stotra mantraनम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च। नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥ तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च । 43