केतु मूल मंत्र
ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः (सामान्य मूल: ॐ केतवे नमः)
त्वचा व चर्म रोगों से बचाव, तंत्र-मंत्र के दुष्प्रभावों का नाश, केतु जनित दोषों की पूर्ण शांति, वैराग्य भाव की जागृति एवं मोक्ष की दिशा में प्रगति 47।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
त्वचा व चर्म रोगों से बचाव, तंत्र-मंत्र के दुष्प्रभावों का नाश, केतु जनित दोषों की पूर्ण शांति, वैराग्य भाव की जागृति एवं मोक्ष की दिशा में प्रगति 47।
इस मंत्र से क्या होगा?
त्वचा व चर्म रोगों से बचाव, तंत्र-मंत्र के दुष्प्रभावों का नाश, केतु जनित दोषों की पूर्ण शांति, वैराग्य भाव की जागृति एवं मोक्ष की दिशा में प्रगति
जाप विधि
गुरुवार या मंगलवार की सायं कुशा के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप करें। अनुष्ठान हेतु १७,००० जप ४० दिनों में पूर्ण करें 47।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
tantrik mantraॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा
bhakti mantraश्री कृष्णः शरणं मम
navgrah mantraॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात्।
vaidik mantraॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
dhyan mantraध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं समंतात्स्थितममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥