नृसिंह गायत्री (वज्रनख) सिद्ध मंत्र
ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात् ॥
आसुरी शक्तियों और नकारात्मकता से दैवीय सुरक्षा 66। यह आंतरिक दुर्बलता को समाप्त कर बौद्धिक तीक्ष्णता (Sharp intellect), भावनात्मक संतुलन और आध्यात्मिक प्रगति को तीव्र करता है 66।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
आसुरी शक्तियों और नकारात्मकता से दैवीय सुरक्षा 66। यह आंतरिक दुर्बलता को समाप्त कर बौद्धिक तीक्ष्णता (Sharp intellect), भावनात्मक संतुलन और आध्यात्मिक प्रगति को तीव्र करता है 66।
इस मंत्र से क्या होगा?
आसुरी शक्तियों और नकारात्मकता से दैवीय सुरक्षा 66
यह आंतरिक दुर्बलता को समाप्त कर बौद्धिक तीक्ष्णता (Sharp intellect), भावनात्मक संतुलन और आध्यात्मिक प्रगति को तीव्र करता है
जाप विधि
बिना तांत्रिक बीज अक्षरों के होने के कारण इसे सामान्य पूजा, जप और ध्यान में सरलता से प्रयोग किया जा सकता है 66।
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स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः । लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् । एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः । अङ्गुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु । अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु ॥ आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः । दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ 14
jap mantraॐ नमो नृसिंहाय हिरण्यकश्यप-वक्ष-स्थल-विदारणाय त्रिभुवनव्यापकाय भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी कुलोन्मूल नाशाय स्तम्भोद्भवाय समस्तदोषान् हर-हर विसर-विसर पच-पच-हन-हन-कम्पय-कम्पय मथ-मथ ह्रीं ह्रीं फट् फट् एह्येहि रुद्र आज्ञापयति स्वाहा
beej mantraह्लीं
dhyan mantraशान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
ugra mantraॐ ह्रीं श्रीं उग्र तारे तुतारे देवदत्त फट्
shanti mantraॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्माऽमृतं गमय ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥