उच्छिष्ट गणपति (नवार्ण) सिद्ध मंत्र
हस्ति-पिशाचि-लिखे स्वाहा ।
संचित कर्मों (Sanchita Karmas) का पूर्ण विनाश 51। यह 'क्षिप्र सिद्धि दायक' (Quick bestower of accomplishments) है 51। साधक का अहंकार शून्य हो जाता है और उसे अपार आध्यात्मिक संपदा, ज्ञान और कुबेर के सम
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
संचित कर्मों (Sanchita Karmas) का पूर्ण विनाश 51। यह 'क्षिप्र सिद्धि दायक' (Quick bestower of accomplishments) है 51। साधक का अहंकार शून्य हो जाता है और उसे अपार आध्यात्मिक संपदा, ज्ञान और कुबेर के समान भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त होता है 51।
इस मंत्र से क्या होगा?
संचित कर्मों (Sanchita Karmas) का पूर्ण विनाश 51
यह 'क्षिप्र सिद्धि दायक' (Quick bestower of accomplishments) है 51
साधक का अहंकार शून्य हो जाता है और उसे अपार आध्यात्मिक संपदा, ज्ञान और कुबेर के समान भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त होता है
जाप विधि
यह तंत्र शास्त्र का अति-गोपनीय साधन है 51। इसे गुरु दीक्षा के उपरांत विशिष्ट न्यासों के साथ जपा जाता है 52। साधक को किसी विशिष्ट भौतिक इच्छा का संकल्प लेने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ऊर्जा स्वतः आवश्यकता पूर्ति करती है 51।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
भैरव शिव का चेला जहां जहां-जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड काचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा ओम गुरु जी गोरख जति मच्छिंद्र का चेला शिव के रूप में दिखे अलबेला कानों कुंडल गले में नादी हाथ त्रिशूल नाथ है आदि अलख पुरुष को करूं आदेश जन्म जन्म के काटो कलेश भगवा वेश हाथ में खप्पर भैरव शिव का चेला जहां जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड कांचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा 2
gyan mantraसदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषं स्वाहा ॥
vaidik mantraॐ सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव । हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।
stotra mantraईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 12
navgrah mantraॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।
kaamya mantraयस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च। सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥