महा-विपरीत प्रत्यंगिरा उग्र मंत्र
ॐ नमो विपरीत-प्रत्यंगिरायै सहस्त्रानेक-कार्य-लोचनायै कोटि-विद्युज्जिह्वायै महा-व्याव्यापिन्यै संहार-रुपायै जन्म-शान्ति-कारिण्यै। मम स-परिवारकस्य भावि-भूत-भवच्छत्रून् स-दाराऽपत्यान् संहारय संहारय, महा-प्रभावं दर्शय दर्शय, हिलि हिलि, किलि किलि, मिलि मिलि, चिलि चिलि, भूरि भूरि, विद्युज्जिह्वे, ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल, ध्वंसय ध्वंसय, प्रध्वंसय प्रध्वंसय, ग्रासय ग्रासय, पिब पिब, नाशय नाशय, त्रासय त्रासय, वित्रासय वित्रासय, मारय मारय, विमारय विमारय, भ्रामय भ्रामय, विभ्रामय विभ्रामय, द्रावय द्रावय, विद्रावय विद्रावय हूं हूं फट् स्वाहा।।
शत्रु द्वारा किए गए भयंकर तांत्रिक प्रहार को दोगुनी शक्ति से उसी पर वापस पलटना (Reversal), सपरिवार शत्रु का समूल संहार और बुद्धि भ्रमित करना 10।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
शत्रु द्वारा किए गए भयंकर तांत्रिक प्रहार को दोगुनी शक्ति से उसी पर वापस पलटना (Reversal), सपरिवार शत्रु का समूल संहार और बुद्धि भ्रमित करना 10।
इस मंत्र से क्या होगा?
शत्रु द्वारा किए गए भयंकर तांत्रिक प्रहार को दोगुनी शक्ति से उसी पर वापस पलटना (Reversal), सपरिवार शत्रु का समूल संहार और बुद्धि भ्रमित करना
जाप विधि
यह अत्यंत उग्र स्तोत्र मंत्र है। विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में महाकाल भैरव ऋषि व त्रिष्टुप् छन्द का संकल्प लेकर रहस्यमयी (गुप्त) ढंग से जप किया जाता है। ऋष्यादि, कर तथा हृदयादि न्यास अनिवार्य हैं 10।
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