उद्देश्य अनुसार मंत्र
मन / मनस्पाप निवारण (६.४५.१)
मन / मनस्पाप निवारण (६.४५.१) वैदिक मंत्र
ॐ परोऽपेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि । परेहि न त्वा कामये वृक्षान् वनानि सं चर गृहेषु गोषु मे मनः ॥
मन में उठने वाले पाप-समूहों का निष्कासन, अप्रशस्त (अशुभ) कामनाओं से स्थायी मुक्ति एवं वैराग्य भाव।
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारवैदिक मंत्र
प्रयोजन
यह मंत्र क्यों?
मन में उठने वाले पाप-समूहों का निष्कासन, अप्रशस्त (अशुभ) कामनाओं से स्थायी मुक्ति एवं वैराग्य भाव।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
मन में उठने वाले पाप-समूहों का निष्कासन, अप्रशस्त (अशुभ) कामनाओं से स्थायी मुक्ति एवं वैराग्य भाव
जाप विधि
जब मन में दुर्विचार, कामुकता या नकारात्मक भावनाएँ उत्पन्न हों, तब इस मंत्र का कम से कम ११ बार मानसिक जप करें।
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