ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.९)

अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.९) वैदिक मंत्र

ॐ त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत । मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥

ब्रह्माण्ड के धारक सर्वोच्च तेज की उत्पत्ति, जड़ता का नाश एवं जीवन में ज्ञान-रूपी प्रकाश का प्रकटीकरण।

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारवैदिक मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

ब्रह्माण्ड के धारक सर्वोच्च तेज की उत्पत्ति, जड़ता का नाश एवं जीवन में ज्ञान-रूपी प्रकाश का प्रकटीकरण।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

ब्रह्माण्ड के धारक सर्वोच्च तेज की उत्पत्ति, जड़ता का नाश एवं जीवन में ज्ञान-रूपी प्रकाश का प्रकटीकरण

जाप विधि

यज्ञीय अरणि-मंथन (काष्ठ से अग्नि उत्पन्न करने की प्रक्रिया) के समय ऋत्विजों द्वारा सम्मिलित स्वर में गान।

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भैरव शिव का चेला जहां जहां-जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड काचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा ओम गुरु जी गोरख जति मच्छिंद्र का चेला शिव के रूप में दिखे अलबेला कानों कुंडल गले में नादी हाथ त्रिशूल नाथ है आदि अलख पुरुष को करूं आदेश जन्म जन्म के काटो कलेश भगवा वेश हाथ में खप्पर भैरव शिव का चेला जहां जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड कांचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा 2