विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में अतल लोक के निवासियों की चेतना की अवस्था को एक अत्यंत निम्न चेतना की अवस्था (Lower state of consciousness) बताया गया है। यहाँ का जीवन अज्ञानता में व्यतीत होता है। इन निवासियों के पास अकूत संपत्ति, सुंदर स्त्रियाँ, रसायन और स्वर्ण होता है किंतु उनमें आध्यात्मिक दृष्टि का पूर्णतः अभाव होता है। वे इतने संपन्न होते हैं कि उन्हें लगता ही नहीं कि उन्हें किसी आध्यात्मिक विकास या ईश्वर की आवश्यकता है। हाटक रस पीकर ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहम कहना इसी चरम अज्ञानता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। अतल लोक में आत्मज्ञान और विवेक का पूर्णतः नाश हो जाता है। यह वह अवस्था है जहाँ जीव सबसे अधिक माया में डूबा होता है। इसीलिए शास्त्र इस लोक को मोक्ष का मार्ग नहीं बल्कि पुण्यों के क्षय का स्थान बताते हैं।
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