विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, पुराणों एवं वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के अंतर्गत संपूर्ण ब्रह्मांड को मुख्य रूप से चौदह लोकों में विभाजित किया गया है। इन चौदह लोकों को दो मुख्य श्रेणियों में विभक्त किया गया है — सात ऊर्ध्व लोक और सात अधोलोक। इन सात अधोलोकों के क्रम में अतल सबसे प्रथम लोक है। यद्यपि अतल लोक अधोलोक की श्रेणी में आता है परंतु इसे किसी भी रूप में नरक नहीं माना जा सकता। श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में इन सात अधोलोकों को सामूहिक रूप से बिल-स्वर्ग या भूमिगत स्वर्ग की संज्ञा दी गई है। अतल लोक सहित सभी बिल-स्वर्गों में ऐश्वर्य, भोग-विलास और भौतिक सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं होती। यहाँ के निवासियों का जीवन देवराज इंद्र के स्वर्गलोक से भी अधिक सुखमय, समृद्ध और विलासितापूर्ण बताया गया है। परंतु यहाँ रहने वाले प्राणियों में आध्यात्मिक चेतना और आत्मज्ञान का नितांत अभाव होता है। अतल लोक पूर्णतः दैवीय नहीं है बल्कि यह विशुद्ध रूप से भौतिक और राजसिक-तामसिक प्रवृत्तियों का चरम केंद्र है जहाँ आध्यात्मिक प्रगति के बिना केवल भौतिक वासनाओं की पूर्ति की जाती है।
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