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भगवान वामन और राजा बलि की कथा क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी, त्रिविक्रम रूप में ब्रह्मांड नापा, और बलि के आत्म-समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें सुतल लोक दिया।

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विस्तृत उत्तर

जब महाराजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में निन्यानवे अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिए थे और वे सौवें अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से देवराज इंद्र का पद स्थायी रूप से प्राप्त करने वाले थे, तब देवताओं पर संकट आया। देवताओं की माता अदिति की तपस्या और प्रार्थना से भगवान विष्णु महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र वामन, एक तेजवान बौने ब्राह्मण ब्रह्मचारी, के रूप में प्रकट हुए। भगवान वामन नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर भृगुकच्छ पहुँचे, जहाँ बलि का यज्ञ चल रहा था। उन्होंने बलि से भिक्षा में केवल तीन पग भूमि मांगी। शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं बल्कि साक्षात् भगवान विष्णु हैं, और बलि को दान देने से रोका। लेकिन बलि ने कहा कि वे प्रह्लाद के पौत्र हैं और ब्राह्मण को दिया वचन नहीं तोड़ेंगे। संकल्प लेते ही वामन ने त्रिविक्रम रूप धारण किया। पहले पग में उन्होंने पृथ्वी और अधोलोकों को, दूसरे पग में ऊर्ध्व लोकों को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान न बचने पर बलि ने अपना सिर अर्पित किया। भगवान वामन बलि के आत्म-समर्पण से प्रसन्न हुए और उन्हें सुतल लोक का राज्य प्रदान किया।

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