विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में भूलोक अथवा भू-मण्डल के आकार की तुलना एक विशाल खिले हुए कमल-पत्र से की गई है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध और श्री विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में इस भू-मण्डल का महाविस्तार पचास करोड़ योजन (लगभग चार अरब मील) बताया गया है। इस विशाल भू-मण्डल की संरचना अत्यंत जटिल, सममितीय और गणितीय पूर्णता लिए हुए है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार जम्बूद्वीप उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर से कुछ दबा हुआ है तथा मध्य भाग में यह अत्यंत विस्तृत और उभरा हुआ है जिससे इसकी समग्र आकृति एक खिले हुए कमल के चार पत्तों जैसी प्रतीत होती है। यह सम्पूर्ण भूलोक सात विशाल वृत्ताकार द्वीपों और उन्हें घेरने वाले सात महासागरों में विभक्त है।
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