विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में भुवर्लोक को 'अंतरिक्ष' के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि यह भौतिक पृथ्वी और दैवीय स्वर्ग के बीच का मध्यवर्ती आकाशीय क्षेत्र है। श्रीमद्भागवत पुराण (५.२४.५) में शुकदेव गोस्वामी स्पष्ट करते हैं कि विद्याधर और सिद्ध लोकों के नीचे के जो आकाश है उसे 'अंतरिक्ष' कहा जाता है। इस अंतरिक्ष की भौतिक सीमा वहीं तक मानी गई है जहाँ तक वायु (हवा) बहती है और जहाँ तक आकाश में बादल तैरते हुए देखे जा सकते हैं। इसके ठीक ऊपर वायु का प्रवाह समाप्त हो जाता है। यह लोक मुख्य रूप से वायु-तत्व और आकाश-तत्व से निर्मित है। यहाँ पृथ्वी-तत्व और जल-तत्व का लगभग अभाव होता है यद्यपि जल वाष्प (मेघ) के रूप में यहाँ सदैव विद्यमान रहता है।
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