विस्तृत उत्तर
प्रत्येक मनके के पश्चात जो गाँठ लगाई जाती है, उसे 'ब्रह्म-ग्रंथि' कहते हैं।
इसका दोहरा महत्व है:
व्यावहारिक महत्व: यह ग्रंथि दो मनकों को आपस में टकराने से रोकती है, जिससे जप के समय ध्वनि नहीं होती और साधक की एकाग्रता भंग नहीं होती। यदि माला कभी टूट भी जाए, तो सभी मनके बिखरते नहीं हैं।
आध्यात्मिक महत्व: ब्रह्म-ग्रंथि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की शक्ति का प्रतीक है। यह प्रत्येक मंत्र द्वारा उत्पन्न ऊर्जा को उसी मनके में 'स्थिर' या 'सील' कर देती है।





