विस्तृत उत्तर
## गुरु का स्वरूप और महत्व
'गु' का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान)।
इस प्रकार गुरु का अर्थ है — *अज्ञान के अंधकार को नष्ट करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला।*
### शास्त्रों में गुरु की महिमा
गुरुगीता में कहा गया है:
> गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
> गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थात् — गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश हैं। गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं।
### गुरु की विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---------|--------|
| ज्ञान | शास्त्र, अनुभव और आत्मज्ञान से संपन्न |
| करुणा | शिष्य के कल्याण के लिए समर्पित |
| निःस्वार्थ | किसी लौकिक लाभ की अपेक्षा नहीं |
| ब्रह्मनिष्ठ | स्वयं ईश्वर में प्रतिष्ठित |
### मुण्डकोपनिषद में गुरु
> 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्'
अर्थात् — ब्रह्म को जानने के लिए वेद-ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए।
### कबीरदास के अनुसार
> गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांय।
> बलिहारी गुरुदेव की, जिन गोविन्द दियो बताय॥
गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है क्योंकि गुरु ही ईश्वर का साक्षात्कार कराता है।
### 'उपनिषद' शब्द और गुरु का संबंध
उपनिषद' का अर्थ है 'गुरु के निकट बैठना' (उप = नजदीक, नी = नीचे, सद = बैठना) — यह गुरु-शिष्य परंपरा का मूल आधार है।





