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गुरु-शिष्य परंपरा📜 गुरुगीता, श्वेताश्वतर उपनिषद, विष्णुपुराण, मुण्डकोपनिषद2 मिनट पठन

गुरु क्या होता है?

संक्षिप्त उत्तर

गुरु वह है जो अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का प्रकाश देता है। शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तुल्य माना गया है। मुण्डकोपनिषद के अनुसार ब्रह्मज्ञान के लिए वेदज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना अनिवार्य है।

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विस्तृत उत्तर

## गुरु का स्वरूप और महत्व

'गु' का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान)।

इस प्रकार गुरु का अर्थ है — *अज्ञान के अंधकार को नष्ट करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला।*

### शास्त्रों में गुरु की महिमा

गुरुगीता में कहा गया है:

> गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

> गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात् — गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश हैं। गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं।

### गुरु की विशेषताएँ

| विशेषता | विवरण |

|---------|--------|

| ज्ञान | शास्त्र, अनुभव और आत्मज्ञान से संपन्न |

| करुणा | शिष्य के कल्याण के लिए समर्पित |

| निःस्वार्थ | किसी लौकिक लाभ की अपेक्षा नहीं |

| ब्रह्मनिष्ठ | स्वयं ईश्वर में प्रतिष्ठित |

### मुण्डकोपनिषद में गुरु

> 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्'

अर्थात् — ब्रह्म को जानने के लिए वेद-ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए।

### कबीरदास के अनुसार

> गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांय।

> बलिहारी गुरुदेव की, जिन गोविन्द दियो बताय॥

गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा है क्योंकि गुरु ही ईश्वर का साक्षात्कार कराता है।

### 'उपनिषद' शब्द और गुरु का संबंध

उपनिषद' का अर्थ है 'गुरु के निकट बैठना' (उप = नजदीक, नी = नीचे, सद = बैठना) — यह गुरु-शिष्य परंपरा का मूल आधार है।
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शास्त्रीय स्रोत
गुरुगीता, श्वेताश्वतर उपनिषद, विष्णुपुराण, मुण्डकोपनिषद
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