विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत महापुराण (5.24.16) हाटक रस के प्रभाव का अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक वर्णन करता है। इस हाटक रस का प्रभाव इतना तीव्र और मायावी होता है कि इसे पीने के उपरांत वह पुरुष स्वयं को ईश्वर समझने लगता है। उसके भीतर इतना प्रबल मिथ्या अहंकार जाग्रत हो जाता है कि वह गर्व से उद्घोष करता है — ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहम — अर्थात मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही सिद्ध हूँ। उसे ऐसा शारीरिक और मानसिक भ्रम हो जाता है मानो उसके भीतर दस हजार विशाल हाथियों का बल आ गया हो। मद में अंधा होकर वह पुरुष मृत्यु के अवश्यंभावी सत्य को भूल जाता है और पूर्णतः वासनाओं तथा अपनी मिथ्या शक्ति के अहंकार में डूब जाता है।
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